दर्द की क़ीमत क्या है? जब मुफ़्त का दर्द इंसान को तोड़ देता हैWhat Is the Price of Pain? When Free Pain Breaks a Person From Within
दर्द की क़ीमत क्या है? किसी ने मुझसे पूछा था— “दर्द की क़ीमत क्या होती है?” मुझे उस सवाल का जवाब तुरंत नहीं मिला। क्योंकि अगर सच कहूँ, तो मुझे दर्द हमेशा मुफ़्त में ही दिया गया है। दर्द ऐसा तोहफ़ा है, जिसे लोग बड़े प्यार से अपने गले लगाकर रखते हैं। कोई बिना सोचे दे देता है, और देने वाले को यह एहसास भी नहीं होता कि वह सामने वाले की ज़िंदगी में क्या छोड़कर जा रहा है। अगर दर्द की सच में कोई क़ीमत होती, तो शायद कोई भी किसी को इतना आसानी से दर्द नहीं देता। हाय… ये दर्द… इतनी बार मिला, इतनी बार सहा, कि अब दर्द क्या है— ये भी समझ में नहीं आता। पूरी ज़िंदगी में इतना दर्द मिला कि दर्द अब पहचान में ही नहीं आता। दर्द कोई भी दे सकता है— घर वाले भी, बाहर वाले भी। जैसा उस गीत में कहा गया है— “आधी घरवाली… आधी बाहरवाली…” अपने दर्द की यही कहानी है। कुछ करो तो भी दर्द, कुछ न करो तो भी दर्द। दर्द तो जैसे एक वायरस की तरह फैल चुका है— जहाँ जाओ, जिससे भी मिलो, हर किसी के पास अपना एक दर्द ज़रूर है। लेकिन मेरे दोस्त, इस दर्द को मुफ़्त में मत लो। और न ही कभी किसी को मुफ़्त में दो। दर्द की भी एक क़ी...